भारत के राजस्थान प्रान्त व मालवा क्षेत्र में करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। इस भाषा में प्राचीन साहित्य विपुल मात्रा में लोक गीत, संगीत, नृत्य, नाटक, कथा, कहानी आदि उपलब्ध हैं। इस भाषा को सरकारी मान्यता प्राप्त नहीं है। इस कारण शिक्षित वर्ग धीरे धीरे इस भाषा का उपयोग छोड़ रहा है, परिणामस्वरूप, यह भाषा धीरे धीरे ह्रास की और अग्रसर है। कुछ मातृभाषा प्रेमी अच्छे व्यक्ति इस भाषा को सरकारी मान्यता दिलाने के प्रयास में लगे हुए हैं।
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Thursday, December 15, 2011
Wednesday, November 30, 2011
जिस दिन तुम आ जाते हो, सचमुच घर जैसा लगता है......
दीवारों का ये जंगल जिसमें सन्नाटा पसरा है ..
जिस दिन तुम आ जाते हो, सचमुच घर जैसा लगता है
उसका चर्चा हो तो मन में लहरें उठने लगती हैं
उसका नाम झील में गिरते कंकर जैसा लगता है
पानी, धूप, अनाज जुटा लूं ......
फिर तेरा सिंगार निहारूं
दाल खदकती, सिकती रोटी ...
इनमें ही करतार निहारूं
तेज़ धार ओ' भंवर न देखूं
मैं नदिया के पार निहारूं ......
जिस दिन तुम आ जाते हो, सचमुच घर जैसा लगता है
उसका नाम झील में गिरते कंकर जैसा लगता है
पानी, धूप, अनाज जुटा लूं ......
फिर तेरा सिंगार निहारूं
दाल खदकती, सिकती रोटी ...
इनमें ही करतार निहारूं
तेज़ धार ओ' भंवर न देखूं
मैं नदिया के पार निहारूं ......
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राजस्थानी मुहावरे
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